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सपरिवार हुए शर्मसार...

Posted On: 17 May, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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65591_164988690178518_100000021635867_567180_1064054_nएक चाय का प्याला लेकर आँगन में निकली ही थी, कि बसंत ऋतू के आने का एहसास हुआ। वही पक्षियों की गुंजन, नए पत्ते, रंग-बिरंगे फूल, तितलियाँ  देखते ही मेरा मन एक लॉन्ग ड्राइव पर जाने के लिए उत्सुक हो उठा। मैंने अपनी कार उठाई और लॉन्ग ड्राइव पर निकल गई।

चारों ओर नए पत्तों की चटख हरियाली, धुप-छाँव  वाले रास्ते, उड़ते  पक्षी, तालाब के किनारे सैर करते लोग, खेतों में हो रही मक्के की बोनी…… बड़ा ही अद्भुत दृश्य था। इसी दृश्य का लुत्फ़ उठाते, मै आगे बढती जा रही थी।  सामने सेब के बगीचे में काम करते मजदूर, सड़क पार कर रहे  थे, उन्हें देखते ही अचानक मैंने ब्रेक लगये, कार झटके से क्रोसिंग पर रुक गयी.  मजदूरों के हाथ में 2-3 ट्रोली थी, जो लाल-लाल सेबों से लदी थी। मेरे मन में एक विचार आया कि मै वहां रुक जाऊ और बच्चों के लिए कुछ सेब खरीद लूँ। ऐसा विचार आते ही मैंने कार बगीचे के किनारे खड़ी कर  दी। बगीचे के सामने बढ़ी ही थी की सामने डैबी आकर खड़ी  हो गई. उन्हें सामने देखकर मैं सकपका गई।  मै सोचने लगी कि, यह डैबी यहाँ कैसे? इसका बगीचा तो दूसरी सड़क पर था। यह सोचते-सोचते मेरे दिमाग  ने अंदाज़ा लगा लिया कि, यह बगीचा  इतना बड़ा है कि इसका दूसरा छोर कही दूर दूसरी सड़क पर है। उन्होंने मुझसे नमस्ते किया। मेरा हाल-चाल पूछा व्  मेरे,  वहां दोबारा आने पर अपनी ख़ुशी जताई। मैंने भी उत्साहित होकर उनका अभिवादन किया। उन्होंने ,मेरे  माता-पिता की इण्डिया में कुशलता पूछी। उनके इस वर्ष अमेरिका आने की योजना के बारे में भी पूछा। मैंने उन्हें बताया कि इस वर्ष कुछ दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे नहीं आ सकेंगे। करीबन पद्रह मिनट बातों का सिलसिला चलता रहा, फिर मै सेब खरीदकर,  बाय बोलकर वहां से घर की ओर चल पड़ी।

वापस ड्राइव करते समय मुझे डैबी से पहली मुलाकात ध्यान आ गई। पिछले बरस कुछ यही समय था. सेब की फसल तैयार थी। इसी बसंत ऋतू के  बाद मेरे माता-पिता मेरे पास अमेरिका आये थे। एक दिन हम  माता-पिता को सेब का बगीचा दिखाने ले गए। उस दिन गौधुली बेला का समय था, सूरज डूबने वाला था। आसमान में लालिमा देखते ही बन रही थी। सड़को पर दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा था।   हम बगीचे में पहुंचे, वहां  कोई नहीं था। हमने आस-पास टहल कर जानने की कोशिश की कि हम किससे बगीचा घूमने की इजाज़त ले। सामने एक छोटा से टेंट दिखाई दिया। वहां पर छोटी-छोटी सेब से भरी हुई टोकरियाँ रही थी, जिन पर उनके दाम लिखे थे। बगल में ही एक गुल्लक भी था, जिस पर लिखा था….. कृपया पैसे यहाँ डाले. वीडिओ कैमरे की सहायता से इस काउंटर पर नज़र रखी जा रही है .” ऊपर कैमरा भी लगा हुआ था। यह देखकर साफ़ पता चल रहा था, की ये सेब बेचने के लिए रखे गए है। दाम ज्यादा होने के कारण हमारी मंशा खरीदने की कतई नहीं थी। हम टेंट से बाहर आये, और बगीचों की तरफ नज़र घुमाई, वहां  से  एक  सुनहरे बालों वाली गोरी मेम आती  दिखाई दी। वह इस बगीचे की मालिक थी। हमने उससे बगीचे में  घूमने की इजाज़त मांगी। उसने हमें सेब न तोड़ने की हिदायत के साथ, बगीचे के किनारे-किनारे घूमने की इजाज़त दी। हम सभी ने (मेरे माता-पिता, पति, दस वर्षीय बेटा, पाँच  वर्षीय बेटी, व मै ) बगीचे के किनारों पर चलना शुरू किया। घुमते-घुमते काफी आगे निकल आये। बगीचे का नज़ारा देखकर , आँखें  फटी की फटी रह गयी । हर एक सेब का   पेड़ कम से कम 200 फलो से लदा  था। सेब के वज़न से पेड़ों की डालियाँ  झुकी जा रही थी। नीचे क्यारियों में भी सैकड़ो की संख्या में फल गिरे हुए थे। चारो तरफ सन्नाटा था। फलों को  चुनने या बटोरने वाला वहां कोई नहीं था। यह देखकर शायद हम सभी का सेब खाने का मन हो रहा था, पर सभी इस कशमकश में थे कि  बगीचे की मालिक द्वारा दी गयी हिदायत के बावजूद भी ऐसा करना उचित होगा या नहीं।  फिर हम सभी ने हिम्मत करके एक-एक फल उठाकर खाए। इतने स्वादिष्ट व रसीले फल हमने अब तक के सम्पूर्ण जीवन काल में कभी नहीं खाए, शायद इसलिए कि वो ताज़ा थे। हम सभी ने और सेब खाए जब पेट भर गया तो, मेरे पिता जी ने आठ-दस फल अपनी  रूमाल में बाँध लिए। माँ ने पंद्रह -बीस अपने दुपट्टे में, मैंने आपने दोनों हाथो में चार-चार फल रख लिए। बच्चे फल खा ही रहे थे।  पतिदेव, भर पेट खाकर हाथ झाड  चुके थे।

देसी मानसिकता है ही ऐसी, कि जब पैसे देकर खरीदना पड़े तो खरीदने की मंशा नहीं होती, और जब मुफ्त  में मिल रहा हो तो हिदायतों के बाद भी लेने से नहीं चुकते…..हा हा हा हा….. शोपिंग मॉल में मिल रहे मुफ्त सेम्पल लेने के लिए घंटों लाइन में खड़े रह सकते है, परन्तु कुछ खरीदने के लिए पेमेंट की लाइन में खड़े होना गवारा नहीं होता… हा…हा….हा…हा…खैर …. अँधेरा बढ़ रहा था, अब  हमने अपनी  कार की तरफ बढ़ाना शुरू किया।  कार के पास पहुँचने ही वाले थे कि पीछे से जोर से किसी ने कड़े स्वरों में आवाज़ लगायी …. रुकिये !!!!!” हम सपरिवार रंगे हाथों पकडे गए…..हमारे तो जैसे पेरों तले  ज़मीन खिसक गयी….  डर  के मारे हमारे कान गरम होने लगे।  मेरे माता-पिता भी घबरा गए। पीछे मुड़  कर देखा तो वही सुनहरे बालो वाली गोरी मेम , नाखुश मिजाज़ में हमारी तरफ बढ़ रही थी।  मै  सोचने लगी कि  अब  क्या जवाब देंगे। वह हमारे पास आकर हमारे इकट्ठे किये सेबो को भरी नज़र देखते हुए बोली… ” ये आपने क्या किया, मैंने आपको बगीचे घूमने की इजाज़त दी, आपने वादा भी किया कि आप सेब नहीं तोड़ेंगे, फिर भी आपने ये सेब तोड़े, मै बहुत नाखुश हूँ “… सुनते ही हमारी नज़रे शर्म से झुक गयी। हमारे पास जवाब  नहीं था। हमें अपनेआप में छोटेपन का एहसास हो रहा था। फिर भी मैंने उससे  माफ़ी मांगी और कहा, कि  “हमने ये फल तोड़े नहीं है, ज़मीन से उठाये है.” मेरे माफ़ी मांगने पर उसके कड़क स्वरों में ढीलापन आया, वह मुस्कुराकर बोली, हां, मै देख सकती हूँ, कि ये अभी के ताज़े टूटे फल नहीं है”. उसकी मुस्कराहट देखकर हमारी जान में जान आई। हमने वार्तालाप चालू किया। वह हमारे भारत की विभिन्न फसलों व भारत के विश्व प्रसिद्द के आमो  के बारे में पूछती रही, (शायद इसलिए कि वह स्वयं इस क्षेत्र से जुडी हुई थी।) हम उसे बताते रहे। बातों ही बातों में माहौल हल्का हो गया। तब उसने बताया  कि  वह डैबी “ है। हम सभी ने भी अपना परिचय दिया। अब पूरी तरह अँधेरा हो चूका था, हमने उससे जाने की इजाज़त मांगी। घर जाते समय रास्ते में हम सभी बाते कर रहे थे, कि ऐसी सपरिवार शर्मसार स्थिति हमारे सामने कभी नहीं आई”… हंसी भी आ रही थी, पर अन्दर शर्म  का एहसास दिल की गहराइयों तक महसूस किया  जा सकता  था। मुझे महसूस हुआ कि , इन्ही आदतों की वजह से हम हिन्दुस्तानी पूरे विश्व में बदनाम है।

मेरे माता-पिता इण्डिया से हमारे लिए “दशहरी” व “अल्फेंजो” आम लेकर आये थे। अगले दिन हम कुछ आम व काजू कतली लेकर डैबी के पास गए, उसे आम देते हुए मैंने कल के लिए पुनः माफ़ी मांगी। आम पाकर वह गदगद हो गयी। शायद हमारे आम देकर माफ़ी माँगने का अंदाज़ उसे बड़ा भा गया…

अभिलाषा शिवहरे गुप्ता

16 मई, 2012



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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

priyasingh के द्वारा
May 24, 2012

आजकल कमेन्ट करना बड़ी समस्या बन गयी है है …….कल भी कोशिश की थी पर सफल नहीं हो पाई आज भी कई बार करने के बाद देखती हूँ इस बार कर पाती हूँ की नहीं ………….. बहुत रोचक संस्मरण साझा किया है आपने ……….

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 23, 2012

बढ़िया संस्मरण………. गलती करना हर किसी का स्वभाव है……. पर जरुरी ये है की हम गलती करके कुछ सीख लें……. आपने गलती करके उसको सही साबित करने की कोशिश न करके बुद्धिमत्ता प्रदर्शित की…….. अन्यथा…….. आदमी अपनी गलती का वकील होता है….और दूसरे की गलती का जज बन जाता है…….. अर्थात अपनी की गई गलती की बड़ी अच्छी सफाई देता है…….. . और दूसरे की गलती होने पर सीधे फैसला दे देता है…. उसका पक्ष भी नहीं सुनना चाहता है….

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 20, 2012

TESTING

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 20, 2012

    खुदा का लाख लाख शुक्र है की आप सभी को एक साथ ही शर्मिन्दा होने का मौका मिल गया ….. वरना अगर किसी एक के साथ यह घटना घटित होती तो ताउम्र बाकि के परिवारिक सदस्य उस बेचारे का मजाक उड़ाते रहते ….. अब उन हसीं लम्हों को याद करके अगर सभी कुछ फिल करेंगे तो इक्कठा ही हँसेंगे नाकि एक दूसरे पर ….. आपसे गुजारिश है की आगे भी ऐसे हालात का निर्माण करते हुए इस से मिलती जुलती हुई मजेदार घटनाओं से हमारा मनोरंजन करती रहिएगा आभार सहित मुबारकबाद

Rajeev Varshney के द्वारा
May 20, 2012

अभिलाषा जी आपकी साहस पूर्ण स्वीकारोक्ति को मेरा विनम्र वंदन. शायद मै ऐसा साहस न जुटा पाता. आज दैनिक जागरण समाचार पत्र में आपका यही ब्लॉग प्रकाशित हुआ है. सादर राजीव वार्ष्णेय

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 21, 2012

    नमस्ते राजीव जी…. बहुत बहुत धन्यवाद्…जो आपने मेरी कृति को इस लायक समझा…. मै इन्टरनेट पर दैनिक जागरण ई पपेर पर देखने की कोशिश कर रही हूँ, पद ढूँढने में असमर्थ हूँ…कृपया मदद करे… धन्यवाद्…

    Rajeev Varshney के द्वारा
    May 21, 2012

    Abhilasha Ji, Please send a mail on my mail i d rvppchd@gmail.com so that I can send you the scan copy of Jagran News paper. regards, Rajeev

yogi sarswat के द्वारा
May 19, 2012

अभिलाशाजी नमस्ते,  अभिलाषा जी, अपने अपना यह संस्मरण हम सबके साथ इस मंच पर बांटा, आपका अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगने का अंदाज़ मुझे भी अच्छा लगा | इतना बढ़िया लेख लिखा है उसके लिए बधाई बोहोत ही खूबसूरती से दर्शाया है आपने हाँ हमारी मेंटालिटी तोह सही मानो में ऐसे ही है, पर सच बोलू आपने जो आम और मिठाई देके आपने देबी के दिल में जगह ज़रूर बना ली होगी

follyofawiseman के द्वारा
May 19, 2012

A particular mode of signifying may be unimportant but it is always important that it is a possible mode of signifying. And that is generally so in philosophy: again and again the individual case turns out to be unimportant, but the possibility of each individual case discloses something about the essence of the world.

चन्दन राय के द्वारा
May 18, 2012

महोदया , आपका निजी संस्मरण सुरुचिपूर्ण बन पड़ा है , आपने अपनी लेखन शक्ति से जैसे चलचित्र मेरी नजरो के सामने चला दिया

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 18, 2012

    श्री चन्दन जी…धन्यवाद..हौसलाफ्जाही के लिए…. आप तो शब्दों के योद्धा है…आपकी सराहना से मेरा उत्साहवर्धन हुआ….

Mohinder Kumar के द्वारा
May 18, 2012

खुलेपन से मन की भावनाओं को उजागर करता एक रोचक प्रसंग. लिखते रहिये

satish3840 के द्वारा
May 18, 2012

नमस्कार अभिलाषा जी / आपका शुरू का लेख पढ़कर लगा कि आप भारत की बसंत ऋतू का वर्णन कर रही हें / क्यों कि आप अमेरिका में हें तो ताज्जुब हुआ कि इतनी जल्दी इंडिया में भरी जेठ की गर्मी में बसंत / खैर जब सेव के बागीचे का जिक्र सुना तो अच्छा लगा कि आप अमेरिका में रह कर भी वसंत का मजा ले सकते हें / आप जिस अंदाज से लिखती हें वो एक दम सरल व् दक्ष लेखक का परिचायक हें / आपने हिन्दुस्तानी मानसिकता की बात की तो ये है ही ऐसी / मुफ्त का चन्दन घिस मेरे भाई वाली आदत शायद ही छूटे चाहे हम कहीं भी क्यों न हो / पर ये भी मानना पडेगा कि किसी भी देश में वहां अपने बनाने में हमारा जवाब नहीं / ये भी हमें विरासत में मिला हें / अच्छा वर्णन /इश्वर करे डैबी और आपके परिवार की दोस्ती दिन दुनी रात चोगुनी फले फूले व् भारत व् अमेरिका की दोस्ती में चार चाँद लगाए /

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 18, 2012

    धन्यवाद् सतीश जी…. जी हाँ..अमेरिका में भी बसंत आती है… अप्रेल और मई में जिसमे तापमान करीबन १२ से २५ सेल्सियस होता है …फिर गर्मी शुरू होती है, जून से अगस्त तक… तापमान ३० से ३५ सेल्सियस…ये है यहाँ की जलवायु….खैर…आपने हिन्दुस्तानी मानसिकता पर मेरा समर्थन किया…और लिखा..” मुफ्त का चन्दन घिस मेरे भाई ,,,,,, बहुत सही कहा है आपने…. ऐसा ही है हमारा व्यक्तित्व….

sheetal के द्वारा
May 18, 2012

अभिलाशाजी नमस्ते, इतना बढ़िया लेख लिखा है उसके लिए बधाई बोहोत ही खूबसूरती से दर्शाया है आपने हाँ हमारी मेंटालिटी तोह सही मानो में ऐसे ही है, पर सच बोलू आपने जो आम और मिठाई देके आपने देबी के दिल में जगह ज़रूर बना ली होगी बधाई :)

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 18, 2012

    धन्यवाद् शीतल जी…. रही देबी के दिल में जगह की…वो तो पता नहीं…. उसके दिल की वो ही जाने….. पर यह मेरे लिए एक सबक था. इतनी शर्मिदगी…की शब्दों में बयां नहीं कर सकती..

nishamittal के द्वारा
May 18, 2012

अभिलाषा जी संस्मरण अच्छा है,परन्तु शायद फिर कभी ऐसा सुअवसर होगा तो हम फिर भी चूकेंगें नहीं

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 18, 2012

भारतीय मानसिकता पर करार व्यंग. हादसे होते रहते हैं. बधाई.

jlsingh के द्वारा
May 17, 2012

अभिलाषा जी, अपने अपना यह संस्मरण हम सबके साथ इस मंच पर बांटा, आपका अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगने का अंदाज़ मुझे भी अच्छा लगा | बढ़िया लेख ,बधाई!

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 17, 2012

कहानी तो अच्छी लगी पर सभी डैबी जैसे नहीं होतें…………

rekhafbd के द्वारा
May 17, 2012

अभिलाषा जी ,अपने अपना यह संस्मरण हम सबके साथ इस मंच पर बांटा ,आपका अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगने का अंदाज़ मुझे भी अच्छा लगा |बढ़िया लेख ,बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    May 17, 2012

    आदरणीय अभिलाषा जी….. हम रेखा जी के विचारों से सहमत हैं…. सादर….

sinsera के द्वारा
May 17, 2012

अभिलाषा जी, नमस्कार, आपके साहस व ज़िम्मेदारी की भावना की दाद देती हूँ…और कोई होता तो कभी न बताता, लेकिन आपने शर्मिन्दगी की कहानी सुनाई…मुझे लगता है ये सोच कर कि फिर कभी कोई देश के नाम पर बट्टा लगाने का काम ना करे..जितनी तारीफ की जाये कम है.. hats off to you….


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