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भेदभाव- स्त्री व पुरुष का.... सुझाव पत्र

Posted On: 8 May, 2012 Others में

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नमस्ते आमिर जी…. अभिवादन करती हूँ आपका और आपकी टीम का, जिन्होंने ये अनोखी शुरुवात करके, भारतियों जो जगाने का ज़िम्मा उठाया. मै अमेरिका में रहती हूँ, पर दिल हमेशा हिन्दुस्तान में ही रहता है.सत्यमेव जयते” का पहला एपिसोड देखकर मेरा दिल झकजोर उठा है. इन्ही बाते का चिंतन करते हुए कुछ मुद्दों को समेट पाई हूँ, जो शेयर करना चाहती हूँ…

भेदभाव…. स्त्री पुरुष का…. कन्या भ्रूण हत्या…. ये कुरीतियाँ, उपज है, अस्वस्थ समाज की. यह हमारे परिवारों व समाज में ही शुरू होता है…. तो इन्हें मिटाने की शुरुवात भी यही से करनी होगी. हमें हमारा सामाजिक ढांचा बदलना होगा…. इसकी शुरुवात मेरे विचार में कुछ इस प्रकार होनी चाहिए…

1. हमें ध्यान देना होगा की एक ही परिवार  में पल रहे बेटो व बेटियों को समानतापूर्ण  तरीके से पला पोसा जाये. दोनों को एक ही समय पर एक ही तरह का भोजन दिया जाये, दोनों के पढाई पर एक ही तरह के प्रयास किये जाये. दोनों को एक ही तरह से प्यार व ममता दी जाये. यही उम्र होती है जब बच्चा इन फ़र्को को समझाना शुरू करता है. यदि इन्ही शुरुवाती दिनों में उन्हें असमानातापूर्ण व्यवहार दिखाई देगा तो वह उनके व्यक्तित्व में शामिल हो जायेगा.

2. यही प्रयास प्राथमिक पाठशालाओं में भी किये जाने चाहिए. प्राथमिक शिक्षा ही बच्चे का व्यक्तित्व बनाते है, इसकी शुरुवात यही से होनी चाहिए. लिंगों के आधार पर बच्चो के बैठाने की जगह का निर्धारण नहीं होना चाहिए. सिलाई-बुने, पाक कला जैसा शिक्षण सिर्फ  लड़कियों तक सीमित न रहकर लड़को के लिए भी अनिवार्य होना चाहिए. दूसरी तरफ हर वो खेल जो लडके खेल सकते है, वह लड़कियों के लिए भी अनिवार्य होने चाहिए.

3. यह मुद्दा बार-बार मीडिया में उठाया जाना चाहिए, जिससे लोगो में जागरूकता आये. टीवी चैनलों पर लैंगिक समानता भरे संदेशों का बार-बार प्रसारित हो. गावों में, सामाजिक संस्थायो द्वारा, स्कूलों  , ओफ्फिसो में, स्पेशिअल सेमीनार व प्रग्राम कराये जावे, जिससे लोगो में चेतना जागे. रेलवे स्टेशनों  में फ्लेश  डांस के जरिया, नाटको के ज़रिये, यह जाग्रति पैदा करायी जाये. ताकि धीरे-धीरे लोगो की सोच बदल सके.

इस पुरुष प्रधान समाज में यह काम पुरुषों से ही करवाया जाने चाहिए, पुरुष वर्ग की मानसिकता में बदलाव लाया जा सके.

4.. कानूनों का सख्ती से पालन अति आवश्यक है. हमारे देश  में गंभीर से गंभीर अपराध भी भ्रष्टाचार की आड़ में दबा दिए जाते है. कानूनों का सही समय पर सही उपयोग इमानदारी  से आवश्यक है. चाहे वो कानून स्वयं माता-पिता,  सास-ससुर या doctors के ही खिलाफ क्यों न हो.

5. हमारे समाज में कुछ ऐसी सामाजिक बुराइयाँ और भी है जो कन्या भ्रूण हत्या तो बढ़ावा दे रही है…जैसे…

“बेटियां पराया धन”…. यह मानसिकता, माता-पिता की सोच को दूषित  कर देती है… हालाँकि यह कुसोच हमारे इतिहास में बहुत पुरानी है. यह सोचकर की बेटी तो क़ल दुसरे घर जाने वाली  है, वो हमारे बुढापे  का सहारा नहीं बन सकती. इसलिए माता-पिता उससे भावनात्मक तरीके से जुड़ नहीं पाते, जिसका प्रतिफल होता है भेदभावपूर्ण व्यवहार व सोच.

लड़कियों का माता-पिता की जायदाद में कानूनन हक है…. यही बात  उन भाइयो व पिता की सोच को कुंठित कर देती है. बेटियां कल शादी करके दुसरे घर चली जाएँगी, यदि उसे हिस्सा दे दिया तो वह भी दुसरे घर चला जायेगा…. यदि बेटो को दिया तो हमारा ही है….. यही  सोच बेटियों को पराया बना रही है…. इसलिए समाज से यह सोच मिटाना बहुत ज़रूरी हो गया है की, “बेटियां परायी है”….

एक बात पर और  प्रकाश डालना चाहती हूँ, की आखिर हमारे समाज में ऐसी संस्कृति बनी ही क्यों, की बेटी के घर एक गिलास पानी पीना भी पाप है…. समाज में इन जिम्मेदारियों को बेटा या बेटी के बीच विभाजित किया ही क्यों गया की बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा, बेटी नहीं ? शायद इसलिए, की यदि “बेटी ने सेवा की  तो संपत्ति का बटवारा, बेटी के साथ दुसरे घर चला जायेगा”…….शुरू से  भेदभाव पूर्ण व्यवहार बेटियों को सदा से ही माता पिता से दूर रखता है…. बिलकुल, बेटियों को भी घर की ज़िम्मेदारी उसी तरह उठानी चाहिए जिस तरह बेटा उठाता है…. पर अफ़सोस की समाज बेटी से करवाना ही नहीं चाहता, उसके पीछे सोच वही है, की सेवा करवाई तो देना पड़ेगा, जो दुसरे घर चला जायेगा…..…. लेकिन यदि किसी कारन वश बेटी उस लायक नहीं है, की घर का ज़िम्मा उठा सके तो उसके प्रति पक्षपात पूर बर्ताव उचित नहीं…उसकी जगह एक बेटा भी हो सकता था, जो इस लायक नहीं है की घर का ज़िम्मा ले सके…पर वह तो पक्षपात पूर्ण व्यवहार का भागीदार नहीं होता…..


यह तो बात हुई एक बेटी की…दुसर तरफ  यही बेटिया जब बहू बनती है तो क्या होता है…

ससुराल पहुँच कर, हर बात पर यही ताना की…”तेरे बाप के घर देखा है”…. यही पराया बर्ताव वहा भी मिलता है… ससुराल वाले उसे दुसरे की बेटी समझते है, इसलिए शायद भावनात्मक तरीके से जुड़ नहीं पाते. बेचारी लड़की, न तो पिता के घर सँवारी  गयी न तो पति के घर…ऐसी ही एक और बड़ी कुप्रथा है…जो आज हर लडके वालो का गौरव बनती जा रही है…

“दहेज़ प्रथा”.. इस प्रथा के कारन बेटियां आज माँ-बाप पर बोझ  बनी हुई है. यदि लड़का या लडके का पिता दहेज़ की उम्मीद न लगाये तो हर लड़की का पिता उसे ख़ुशी से पालेगा. इस प्रथा का अंत आवश्यक है.

सारी बाते, आदमी के सोच का ही नतीजा है….ये सभी कुरीतियाँ कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देती है….समाज की सोच व मानसिकता बदलनी होगी.  यही मानसिकता ही लोगो को यह भेदभावपूर्ण कुकृत्य करवाती है….

इसे बदलने के लिए लगातार लोगो के दिलों व दिमाग पर आक्रमण आवश्यक है. ठीक उसी तरह जिस प्रकार”करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान” …. जिसे हम“ब्रेन वाशिंग” कहते है.

वही दूसरी तरफ एक सुद्रह्द कानून व्यवस्था सर्वोपरि है. जिसके तहत गुनाहगार को कड़ी सजा अनिवार्य होनी चाहिए. व्यवस्थाये पारदर्शी व निष्पक्ष होनी चाहिए. गलत कार्यों  के खिलाफ तत्काल फैसला, लोगो के दिलो में कानून के प्रति यह विश्वास दिलाता है, कि व्यवस्थाये सुद्र्ह्द है, और आगे गलत कार्य करने के प्रति डर पैदा करता है.

मुझे पता है..यह इतना आसान नहीं है… हर कुरीति गलत सोच का प्रतिफल है…. सोच बदलने में generations, लग जाती है…आज का प्रयास…हमारा क़ल सुधार सकता है…. इसलिए हमें प्रयास करते रहना चाहिए. हर संभव प्रयास  इसे ख़त्म न सही पर नियंत्रित तो कर ही सकते है….. यही नियंत्रण हमारे समाज  के लिए एक नयी शुरुवात हो सकती है…

यही ज़िन्दगी है मेरे दोस्त….. चलते रहना ..बढ़ते रहना…… हर नयी समस्यायों   को  हराकर आगे बढ़ना…. समस्या  क्या है…आती रहती है, जाती रहती है…. …..उनसे क्या डरना… आने वाली समस्या , जिसका अभी अस्तित्व भी नहीं है..उससे डर कर बैठना बुस्दिली है….

“नीयत से किये गए प्रयास ही उप्लब्ध्ही की कुंजी है”….


अभिलाषा शिवहरे गुप्ता

मई ८, २०१२



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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 12, 2012

मेरा स्पष्ट मानना है की हमें अपने देश मे शादी को एक खर्चीला आयोजन बनाने के स्थान पर इसको सहज बनाने की कोशिश करनी चाहिए……. हमें ये प्रयास करना होगा की शादी करना किसी लड़की के घरवालों के लिए बोझ न बने…… अपितु दो परिवार सहज परिवेश मे साथ आयें….. और जहां तक एक परिवार मे पालन पोषण की बात है तो मुझे नहीं लगता की लड़की को पालने मे या लड़के को पालने के कुछ अतिरिक्त खर्च होता है….. बस सही तरीके से संस्कार देकर दोनों को ही समाज के लिए एक उदाहरण बनाया जा सकता है…….. अच्छा लेख……..

Laveena Behl के द्वारा
May 10, 2012

आपका लेखन सराहनीय है.. पढ़े लिखे समाज में भी ये संकीर्ण सोच जि़ंदा है यह सोच के अफ़सोस होता है. बेटी तो घर की रौनक है.. क्यों देवी माँ के इस स्वरूप को सिर्फ़ कन्या के दिन मान सम्मान मिलता है. . कहीं ऐसा न हो   जाए कि कन्या पूजने के लिए समाज में बेटियाँ ही न बचें.. 

चन्दन राय के द्वारा
May 10, 2012

महोदया अभिलाषा जी , आपने सही लिखा है ,हमे अपनी सोच को बदलना होगा , आपका सुझाव पत्र विचार करने योग्य है \ बधाई

sheetal के द्वारा
May 10, 2012

aaa

narpender के द्वारा
May 10, 2012

बहुत सुंदर भाव समाज में कुछ बदलाव तो होगा ही। लेकिन अभीलाषा जी जस हम सब एक साथ होंगे तो ही भारी पहाङ को उठा फेंक सकते हैं आप कहां रहते हैं दिल्ली या बहार कहीं

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 9, 2012

आदरणीय अभिलाषा जी, नमस्कार सबसे पहले तो मैं आपके द्वारा आमिर खान को कहे शब्दों के लिए कुछ कहना चाहूँगा जो अभी अभी मैंने आदरणीय जवाहर सर के ब्लॉग पर लिखा है………………..वो इस प्रकार है … आज हम यह सिर्फ इस लिए क्यूँ कह रहें है की इसे आमिर खान दिखा रहें है…………..सोचने की बात यह है की निश्चय ही एक बड़े ब्रांड के द्वारा कुछ कहने का हम पर व्यापक प्रभाव पड़ता है ……….और एक सर्तक पहल देख उस व्यक्ति के प्रति इज्जत की भावना भी आती है………..किन्तु जब यह सुनने को मिलता है की वही व्यक्ति इन जैसे समाजिक कार्यों के प्रश्नों को भी जिसे वह इतने प्रभावी ढंग से उठा रहा है एक मोटी रकम से तौल रहा है और आज तक के सबसे ज्यादा पैसे लेने के रिकॉर्ड पर ज्यादा जोड़ दिया जा रहा है तब कहीं ना कहीं उस श्रधा में एक गिरावट आती है……….जवाना खराब है और जो दिखता है वही बिकता है…….और आमिर खान वही कर रहें है…….किन्तु चुकी यह एक सार्थक पहल है हमें इसे गंभीरता से लेना चाहिए…………..वैसे जिन्हें सचमुच में इन मुद्दों की परवाह है उन्हें जगाना नहीं पड़ता और जिन्हें जगाना पड़ता है वो जाग कर भी कुछ नहीं करने वाले………….आप देखते जाइए आगे क्या होता है………..इसे मेरा नकारात्मक पक्ष ना माना जाय ……..में बस एक सोच रख रहा हूँ……….. इसके अलावा आपके द्वारा जो तर्क दिए गएँ है वो पढने में तो बड़ा अच्छे लग रहें है किन्तु व्यवहार में आने में असमर्थ है क्यूंकि मेरा मानना है की इसका समाधान सिर्फ हमारी सोच को बदलने से हो सकता है……..और थोड़ा हम बदल भी रहें है इन मामलों में…………आज महिला पुरुष में कोई खास अंतर नहीं रह गया है……………….. लेख के लिए बधाई

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    आनंद जी..मई एक उधाहर प्रस्तुत करना चाहती हूँ…. जो बच्चा पढाई में होनहार है, वह ज़िन्दगी खुद ही सँवार लेगा….जो मंद बुद्धि है, वो शायद कुछ न कर पाए…किन्तु….. जो औसत है, उन्हें पढाई के प्रति जागरुक करके, या मेहनत करा के संवारा जा सकता है…ठीक उसी प्रकार, जो जागे है…वो तो खुद कुछ प्रयास करंगे… जो सोने वाले है, वो जाग कर भी कुछ नहीं करेंगे…..किन्तु…. जो कभी चैतन्य हुआ करते थे, पर किसी कारन से उनकी चेतना ख़त्म हो गई थी..उन्हें खुरेदाने से वो फिर आगे बढ़के प्रयासरत होएंगे…. और…हार मान लेने से अच्छा है, खेलकर हारो….. रही बात आमिर के ब्रांड और मार्केटिंग की…. तो ठीक है..उसमे कुछ गलत नहीं दीखता मुझे…. यदि वो पैसे के लिए भी यह शो कर रहे है है, तो उससे हमें कुछ फर्क नहीं पड़ता…पर मुद्दा तो सराहनीय है… समाज में सन्देश तो पहुँच ही गया…. असफलताओ से डरकर यदि हम कोशिश ही न करे तो या कारयता होगी…. बहुत बहुत धन्यवाद्…. आपकी टिपण्णी के लिए….. स्वस्थ discussion हमेशा समस्या का हल निकाल लेते है….

    jlsingh के द्वारा
    May 10, 2012

    इसका समाधान सिर्फ हमारी सोच को बदलने से हो सकता है……..और थोड़ा हम बदल भी रहें है इन मामलों में…………आज महिला पुरुष में कोई खास अंतर नहीं रह गया है……………….. आनंद जी, आमिर ने अंत में यही कहा था जादू की छड़ी हम और आप हैं, मैंने भी अपने लेख में आत्मावलोकन की बात कही थी! जब तक हमारी सोच में परिवर्तन नहीं आयेगा कुछ नहीं होने वाला ! आमिर का कार्यक्रम एक बार झकझोड़ कर जगाने का काम कर रहा है…. अगर जगे रहें तो ठीक नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रहें …. अभिलाषा जी की भी कुछ बाते— करत करत अभ्यास से ….. और “नीयत से किये गए प्रयास ही उप्लब्ध्ही की कुंजी है”…. सराहनीय है .. करना हमें ही है वे तो सिर्फ जगाने का काम कर रहे हैं. धन्यवाद!

yogeshkumar के द्वारा
May 9, 2012

मैडम आपके ब्लॉग को देखकर जिसमें आपने शीर्षक कुछ सुझाव पत्र के रूप में दिया है…और समस्याओं का सटीक आकलन भी किया है ….मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है..समस्या का समाधान आपके ब्लॉग में भी नहीं है… बस एक सलाह है लोगो के सोच बदलने की….और ये सलाह मैं बचपन (जब से मैंने होश संभाला है ) से सुनता आ रहा हूँ मगर होता कुछ नहीं … इस सोच को बदलेगा कौन?? जाहिर सी बात है इस सोच को महिलाएं ही बदल सकती हैं….. अगर महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला कर चलना चाहती हैं तो उन्हें भी घरकी जिम्मेदारी उतनी ही शिद्दत से उठानी चाहिए… उस हालत में तो और भी जब की वे अपने माता पिता का एकमात्र सहारा हैं… मगर अफ़सोस के साथ सूचित करना पड़ रहा है… मैं अपनी जीवन ऐसे उदहारण बहुत कम देखा हूँ.. लगभग ना के बराबर… बहुत कहानी है लिखने को ..खैर…. KEEP BRAINWASHING OF PEOPLE, THERE IS POWER IN PEN TO CHANGE THE THOUGHT AND IDEA OF HUMAN…

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    नमस्ते योगेश जी… बहुत खूब कहा आपने…”अगर महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला कर चलना चाहती हैं तो उन्हें भी घरकी जिम्मेदारी उतनी ही शिद्दत से उठानी चाहिए… उस हालत में तो और भी जब की वे अपने माता पिता का एकमात्र सहारा हैं” …… इसी बात पर मै भी प्रकाश डालना चाहती हूँ, की आखिर हमारे समाज में ऐसी संस्कृति बनी ही क्यों, की बेटी के घर एक गिलास पानी पीना भी पाप है…. समाज में इन जिम्मेदारियों को बेटा या बेटी के बीच विभाजित किया ही क्यों गया की बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा, बेटी नहीं ? शायद इसलिए, की यदि बेटी ने किया तो संपत्ति का बटवारा, बेटी के साथ दुसरे घर चला जायेगा…….शुरू से या भेदभाव पूर्ण व्यवहार बेटियों को सदा से ही माता पिता से दूर रखता है…. बिलकुल, बेटियों को भी घर की ज़िम्मेदारी उसी तरह उठानी चाहिए जिस तरह बेटा उठाता है…. पर अफ़सोस की समाज बेटी से करवाना ही नहीं चाहता, जिसका कारन का उल्लेख मै पहले लिख चुकी हूँ…. लेकिन यदि किसी कारन वश बेटी उस लायक नहीं है, की घर का ज़िम्मा उठा सके तो उसके प्रति पक्षपात पूर बर्ताव उचित नहीं…उसकी जगह एक बेटा भी हो सकता था, जो इस लायक नहीं है की घर का ज़िम्मा ले सके…पर वह तो पक्षपात पूर्ण व्यवहार का भागीदार नहीं होता….. मेरे ही परिवार में मेरी मौसी ने मेरी बूढी नानी का ख्याल रखा, उनका, इलाज, से लेकर तो हर चीज़ का ख्याल रखा , उन्हें आपने साथ अपने ही घर में बुढ़ापे में सहारा दिया… ३-३ मामा के होते हुए भी…लेकिन जब जायदाद बटवारा हुआ तो नानी को उनके बेटे ही याद आये… सवाल जायदाद का नहीं है… सवाल है पक्षपात पूर्ण व्यवहार का… उस सोच का है की बेटी को दिया दुसरे घर चला जायेगा…..खैर…. सारी बाते, आदमी के सोच का ही नतीजा है…. हर कुरीति गलत सोच का प्रतिफल है…. सोच बदलने में generations, लग जाती है…आज का प्रयास…हमारा क़ल सुधर सकता है…. इसलिए हमें प्रयास करते रहना चाहिए… बुत बुत धन्यवाद् लेख पढ़ कर उस पर टिपण्णी करने के लिए…

    yogeshkumar के द्वारा
    May 10, 2012

    आपने आमिर खान के प्रोग्राम में एक बात गौर की होगी….भ्रूण हत्या के समस्या का कारण खुद उस एपिसोड में ही मौजूद था….. गौरतलब ये है कि जिन महिलाओं के आमिर ने interview लिए, वो खुद इस समाज कि सताई हुई थी… उनमें से एक महिला डाक्टर थी… अब सोचिये उस माता-पिता के बारे में जिसने उसको पैदा किया होगा…बड़े लाड़ प्यार से पाला होगा…पढाया लिखाया..डाक्टर बनाया…और अंत में उन सब प्यार मुहब्बत कि भावनाओं को दरकिनार करके उसकी शादी ऐसे परिवार में कर दी जहाँ उसकी शिक्षा की,,या खुद उसकी कोई अहमियत नहीं.. एक महिला दिन में सास ससुर के लिए नौकरानी और रात में एक पति के लिए खिलौना…. ये सब देखकर एक माँ बाप के दिल में क्या बीतती होगी..अफ़सोस होता है ये देखकर!!!!!… ये सब देखकर माँ बाप यही सोचता है कि वो एक लड़की दुनिया में ना ही आये तो अच्छा है…. भ्रूण हत्या का ये एक महत्वपूर्ण कारण है… मैंने अपने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई मित्रो कि शादी में देखा है …सास ससुर दामाद के पैर छूते हैं… यहाँ तक कि केवल दामाद के नहीं बल्कि लड़के परिवार के बहुत से अपने से छोटी उम्र के लोगों के….!!!!! लड़की वालों को झुक कर रहना पड़ता है…. really disgusting !!!!!!!!. अब ऐसी हालत में माँ बाप कभी कभी अपनी स्थिति के आधार पर एक बच्ची को इस दुनिया में आने से नहीं रोकेगा तो क्या करेगा ????? जिस बच्ची को इस दुनिया में हर पल तिल -तिल कर मरना है… पैसा तो इन सब मुद्दों के लिए बहुत बड़ा कारण है…. एक आदमी पाई-पाई एकत्र करता है और बाकि इधर उधर से कर्जा लेकर सब लड़की कि शादी में बतौर दहेज़ देता है….??? लड़की भी हाथ सी गयी.. पैसा भी हाथ से गया और रही इज्जत की बात तो वो भी लड़के वालों के सामने कुछ नहीं.!!!!!!! आपने एक बात और गौर कि होगी आने वाली नयी पीढ़ी कभी लड़की के नाम पर या उसकी जाति के आधार पर निर्धारित नहीं होती …. अब मैं ये सोचता हूँ इन समस्याओं को कौन बदलेगा… महिलाये खुद.!!!!!! अब अगर महिला अपनी शादी को जीवन का बहुत बड़ा मुद्दा बनायेंगी तो नहीं होगा…

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 11, 2012

    योगेश जी आपका..एक-एक शब्द सच्चाई बताता है… सहमत हु आपके हर वाक्य से… स्त्रियाँ हो या पुरुष..सभी को अपनी मानसिकता बदलनी होगी…. आने वाकी नयी पीढियों के उनकी प्रथ्निक शिक्ष से ही सीखन होगा, जो उनकी मानसिकता के निर्माण में सहायक होगा… समय लगेगा…पर हम इसपर नियंत्रण ज़रूर कर लेंगे…. सती- प्रथा, पर्दा-प्रथा, स्त्री-अशिक्षा….इन सभी पर हमारे समाज ने काफी हदों तक विजय पा ली है…इस मुद्दे पर भी हमने देखा है लोगो की मानसिकता बदलते… विश्वास है की इस पर हम पूरी तरह नियंत्रण कर पाएंगे……

meenakshi के द्वारा
May 9, 2012

अभिलाषा जी , आपने सही लिखा है – स्वयं हम सभी ने और…कुछ नहीं.. लेकिन ये बात तो शायद जरूर सुनी होगी ““बेटियां पराया धन”…होती हैं . हमारे जन्म से ही भेद-भाव शुरू हो जाता है . आमिर खान के इस अभियान से निश्चित ही फर्क आएगा …समाज में ” कन्या भ्रूढ़ हत्या ” बंद हो जाएगी .और महिलाओं की स्थिति दिन -पे- दिन बेहतर हो जाएगी . क्योंकि किसी नेता वगैरह का किसी बात / मुद्दा का उतना असर नहीं होता जितना यहाँ के अभिनेताओं / सिने-स्टार का होता है . बहुत-२ शुभकामनाएं . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद् मिनाक्षी जी…. सामाजिक ढांचा बदलने के लिए हमें सिने स्टार की ही ज़रुरत होती है…. क्योंकि हम भारतीय उनके पीछे दौड़े चले जाते है…और उनके विचार व स्टाइल को आपना बनाने की कोशिश करते है…. वर्ना इस कार्य के लिए पिछले ३० वर्षों से हमारे सामाजिक सेवक लगे है..पर भारत इतना कभी जागृत नहीं दिखा जितना आज आमिर जी की शुरुवात से दिखा है….

yogi sarswat के द्वारा
May 9, 2012

आमिर खान की अपनी एक विशेष शैली है अपनी बात कहने की ! इस शैली में ही वो सामाजिक कुरीतियों पर भी चोट कर जाते हैं और अपना व्यापर भी बनाये रखते हैं ! आपने कई कारण गिनाये हैं , स्वीकार करते हैं , लेकिन एक बात मैं भी कहना चाहता हूँ , हमें भारतीय समाज को समझना पड़ेगा , उसके अन्दर के डर को हटाना पड़ेगा तभी आमिर खान की मुहीम सफल हो सकती है ! हमारी शुभकामनाएं उन्हें और आपको बधाई की आप इतना बेहतर लेख इस मंच पर लेकर आये !

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    धन्यवाद्, लेख पढ़ने के लिए….बिलकुल सही योगी जी…. हमें डर से बहार निकलना होगा… हर बात में समाज का डर… यह मानसिकता बदलनी होगी….. सामान्यतः… किसी भी समाज में कुरीतियों का कारन है बुरी मानसिकता…. डर से बहार निकल कर मानसिकता बदलना संभवतः अच्छे परिणाम सामने ला सकता है…

satish3840 के द्वारा
May 9, 2012

नमस्कार मैडम / आपने कन्या भेद भाव के कई कारण गिनाये / पर एक मुख्य कारण से में पुरी तरह से सहमत हूँ / आज भारतीय समाज विशेषकर अग्रवाल समाज में लडकी की शादी में होने वाले खर्च जिसे लोग दहेज़ कहते हें ही एक मुख्य कारण हें कन्या के भेद भाव का / उसका दर्द वो माँ बाप समझ सकते हें जिनको अभी लडकी की शादी करनी हें / उनमें से मैं भी हो सकता हूँ / आज कोई नवयुवक न वंश की चिंता करता हें / पर जब वो बेटी के लिए योग्य वर की खोज में जाता हें तो शादी में खर्च की जाने वाली रकम सुनकर वो उस दिन को कोसता हें जब वो बेटी का बाप बना / आज मामूली से मामूली शादी में ४ से ६ लाख का खर्च आता हें / लडकी की पढाई पर अलग से खर्च होता हें / कोई मध्यम आय वाला इस खर्च को कैसे उठाता हें इसे वो ही जनता हें / आप एक डमी रिश्ता लेकर किसी के घर जाइए तो आप कोशादी में खर्च होने वाले पैसे का पता आसानी से लग जाए गा / यही कारण हें कन्या भ्रूण ह्त्या का व् भेदभाव का / आज लडकी को उसका पिटा अपने लड़कों से कहीं ज्यादा प्यार व् लायक बनाना चाहता हें पर जब शादी की बात आती हें तो खर्च देख उसकी निराशा का पता लगाया जा सकता हें / यही कारण हें की आज भारतीय समाज में विशेषकर अग्रवाल , व् अन्य समाज में लडकी की कोई चिंता नहीं होती / चिंता होती हें तो शादी में होने वाले खर्च की /

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    सतीश जी, धन्यवाद् लेख पढ़ने के लिए.. यह सिर्फ अरवल समांज की समस्या नहीं है….. लगभग सभी समाजो में यह हो रहा है…दरअसल हमारे देश की विडंबना ही है, की एक समस्या का एक कारन नहीं है…कई कारन है….कही आपको एक कारन सक्रीय दिखेगा तो कही दूसरा कारण सक्रीय दिखेगा. कही दहेज़ कारन है, तो कही “बेटी पराया धन” का एहसास….. इस विश्व में सदा ही ताकतवर प्राणी … कमज़ोर प्राणी पर हुक्म करता है… यही कारन भी हो सकता है की लोग सोचते है की, हम एक लड़की के माता-पिता बनकर क्यों कमज़ोर बने… लडके का पिता होना ही सही है….. इस मानसिकता से बहार आने के लिए, हमें लड़कियों को पढ़ा-लिखा कर इतना आगे ले जाना चाहिए की वो लड़को की बराबरी कर सके, ताकि वो कमज़ोर न बचे…. महाराष्ट्रियन परिवारों में यह स्थिति देखि जा सकती है…. जहा महिलाये शायद पुरुषो से ज्यादा आगे बढ़ रही है… इसलिए वह ऐसा कुकाम हमारे प्रदेशो की तुलना में बहुत कम है… महाराष्ट्रियन महिलय बहुत स्वव्लान्भी होती है…हमें भी हमारे परिवारों में बेटियों के self saficient बनाना बहुत ज़रूरी है …. जिस सम्माज में जो कारन सक्रीय दिखे हमें उस के हिसाब से हल धून्दना होगा…. हर जगह कारन अगल है तो हल भी अलग होगा….

rekhafbd के द्वारा
May 9, 2012

अभिलाषा जी ,आपने सही लिखा है ,हमे अपनी सोच को बदलना होगा ,आपका सुझाव पत्र विचार करने योग्य है \बधाई

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    धन्यवाद् रेखा जी लेख पढ़ने के लिए… कुरीतिय बुरी व पिछड़ी मानसिकता की ही उपज है….आपने मेरे लेख का सार वाक्य तुरंत पकड़ लिया….

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 9, 2012

अभिलाषा जी नमस्कार, आपके विचारों से सहमत. “नीयत से किये गए प्रयास ही उपलब्धि की कुंजी है”…. सार्थक आलेख. आभार……

sheetal के द्वारा
May 9, 2012

Hello Abhilasha ji let me congratulate you on writing such a wonderful and meaningful blog on girls or to make it more precise “Daughters” you have very correctly appreciated the amazing work that Mr Aamir Khan and his team are doing through his show called “Satyamev Jayate” Your views and points in the blog are to the point and so very correct. It is so true our society really needs to change their mentality and thought towards a girl child, this is a battle which each and everyone have to fight and it can be fought only by awareness, its a slow change but yes it can and will happen.

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    Thanky u sheetal ji…. u read the article, i m glad…..

follyofawiseman के द्वारा
May 8, 2012

अभी कुछ पहले मैंने माँ को कहते हुए सुना ’बेटी आन के, पुतहु प्राण के’ (बेटी दूसरों की होती है, बेटे की पत्नी अपनी होती है….same thing as you said….’बेटियाँ पराया धन….’) आपकी सलाह सुंदर है….लेकिन दमदार नहीं…..अभी मैं ने किसी के ब्लॉग पर कमेंट किया था (वो लेख भी इसी विषय से संबंधित था……..)…… ‘मुझे भी शो अच्छा लगा था….और मैं ने सराहना भी की थी….लेकिन जो कमी मुझे आमिर खान के 3 idiots मे दिखी थी वही कमी मुझे इस शो मे भी दिखी……बात अच्छी है लेकिन गहरी नहीं…..मामले को आखरी तह तक छूने की कोशशी नहीं की गई है……..’ थोड़ा गहरा और जाने की जरूरत है………विचारों को अभी सलाह मत बनाइए…..नहीं तो बाद मे बदलना मुश्किल हो जाएगा……अभी और कूदेरने की ज़रूरत है….

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    मुझे आपका नाम नहीं पता … तो संबोधन नहीं लिख सकती…… यही तो हमारे देश की विडंबना है, की एक समस्या का एक कारन नहीं है…कई कारन है…. शायद आपने पूरा लेख नहीं पढ़ा….यदि मैंने लेख मे लिखा है की “बेटिया पराया धन ” होती है, यह मानसिकता बेटियों के प्रति पराया बर्ताव कराती है ….तो दूसरी तरफ मैंने यह भी लिखा है की, ससुराल में दहेज का लोभ, पराया रिश्ते का एहसास बहू के प्रति भेदभाव कराता है..दोनों ही कारण है इस समस्या के. कही आपको पहला कारन सक्रीय दिखेगा तो कही दूसरा कारण सक्रीय दिखेगा…यदि आप इस बात पर विश्वास करते है की “पुतहु प्राण के”… और यदि यह कहावत सच होती तो, शायद आज कोई भी बहु प्रताड़नाओं का शिकार नहीं होती…. स्त्री के जीवन का यही कडुआ सच, जो आमिर जी ने सामने लाने की कोशिश की है….की “लड़की न तो पिता के घर सँवारी गई न तो पति के घर”… इन सभी बातो का उल्लेख मैंने अपने लेख में भी क्या है, इसलिए आपका analysis, मुझे गलत लग रहा है…. ऐसा analysis दर्शाता है की आपने लेख पूरी तरह पढ़ा ही नहीं. उसकी गहराइयों तक आप गए ही नहीं…लेख में गहराई की ज़रुरत नहीं है…लेख पढ़ने वालो की सोच में गहराई की ज़रुरत नहीं है. रही बात आमिर जी के शो में कमियों की, तो देश के बड़े बड़े दिग्गजों ने इस शो की सराहना की है…आमिर इस शो के ज़रिये, समस्याओ से भारतियों अवगत कराना चाहते है न की आपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है….. हम यहाँ उनके शो की तारीफ या आलोचना करने की बजाये समस्या का हल ढूंढे व लोगो को जागृत करे, वो ज्यादा फलकारी व काबिले तारीफ होगा. ….

    dineshaastik के द्वारा
    May 9, 2012

    हम  भारतियों का सबसे बड़ा दोष यह है कि दूसरों की सौ अच्छाईयों को  न देखकर, उसकी एक  बुराई की उँगुली को ही पूरा शरीर समझ  लेंगे। और अपनी एक  अच्छाई के रूमाल  से लंका सदृश्य  बुराईयों को ढ़क  देंगे। नई  नई परिभाषायें भी अपने हिसाब से गढ़ लेगें। और तर्क  तो ऐसे कि आचार्य रजनीश  भी, छोटे लगने लगें। अरे भाई एक  अच्छे प्रयास  की सराहना न  करके, उसकी कमियाँ निकाल  कर क्या साबित  करना चाहतें हैं आप? वो साबित कर चुके हैं आप, मुझसे कहीं अधिक  योग्य  हैं आप, अपनी उर्जा को नकारात्मक  कार्यों में क्यों व्यय  करते हैं आप। उर्जा आपकी मर्जी आपकी, लेकिन सलाह मेरी, जो संभवतः आपके मानने योग्य नहीं है। आप आपनी आदत से मजबूर हैं और मैं अपनी। चलो एक  खेलते हैं, क्यों न अपनी अपनी आदत बदल  लें। लेकिन उससे लाभ  क्या, स्थिति तो यथावत ही रहेगी।

    follyofawiseman के द्वारा
    May 9, 2012

    अभिलाषा जी व दिनेश जी……. मुझे लग रहा है न तो आप लोग देश की समस्या को ले कर उत्सुक हैं और न ही इस इस लेख ली समस्या को ले कर……मुझे लग रहा है आप लोग बस आमिर खान मे उत्सुक है……. “सदियों से आदमी इस भ्रम मे जीता आया है,,,,इस सदी के बाद कोई बेहतर सदी होगा……” 

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 9, 2012

    श्री फोल्ली wise man…बात यहाँ आमिर जी की नहीं है…. बात है देश के जवलंत समस्याओ की…. आमिर जी की जगह शायद यदि आप ये शो लेकर आये होते तो मै आपको भी उतना ही सपोर्ट करती जितना आमिर जी को कर रही हु…. शयद आप बात की तह तक पहुचना ही नहीं चाहते…..

    sheetal के द्वारा
    May 9, 2012

    Mr Wiseman, I respect your comments and views on this particular blog but i am sorry to say that i do not agree with you, i would like to highlight over here saying that we have to change the way we think, and thats what this show is all about bringing change in the way we think. If you think that a daughter in law is your own than why dont you also understand the fact that the same daughter in law is a women too, If you feel that the show or this blog does not have depth if you dont mind could you please elaborate on your comment i am keen on knowing what are your thoughts about a women or a daughter…

    follyofawiseman के द्वारा
    May 9, 2012

    Miss Sheetal, you wrote ” I respect your comments and views on this particular blog but i am sorry to say that i do not agree with you,…” but let me tell you I don’t care whether people respect or not….I don’t care much about respectability…and if you don’t agree its fine what can I do about this… “if you dont mind could you please elaborate on your comment i am keen on knowing what are your thoughts about a women…………” read this…. All These Girls Are Lesbian…! The other day, I happened to read an absurd ad-article, which was published on the first page of a prominent news paper. The heading of article was ‘No Shave, No lipstick. It was written there that more than 80% girls don’t like man with stubble or beard. And these women have started a movement which they are calling, ‘No Shave, No Lipstick Movement’. Many divas of bollywood have associated themselves with this ‘No Shave, No Lipstick Movement, they say that man look best when ‘clean-shaven’, and unless man shave daily, they won’t wear lipstick. I find this issue worth discussing, for I feel, in today’s time where relationship between man and woman are hitting the bottom rock every now and then, it would be worth while to make a conscious effort to understand the complexity of the matter which is accountable for more than 90% problems in the world. Here, I would like to shed light on two vital points, First, it might be shocking for you to know but, if you ask a psychologist, they would say, women with this sort of mindset (where they like well-groomed man), are either lesbian or sexually perverted, because knowingly or unknowingly, their unconscious interest is in the women only, They are not attracted in opposite sex, more or less, they are interested in the same sex. There are woman whom you would find behaving like man, they prefer to dress like man, and they chose the same career option which men chose. And, in it’s enthusiasm to out perform men, they adopt all kind of stupid things from man, they smoke, they drink and abuse. In addition to all these, they even start feeling and thinking like man. And, in long run, they become nothing but ‘A-Second-Grad-Man’. They think this पागलपन is growth, but, it is any thing but growth. In fact, it is degradation. Here, it will be helpful to know that, difference between man and woman is not of quality but of quantity. No man is absolutely man and vice versa. In every man something of woman exists and so is the case with woman. Second thing which I would like to bring to notice is, its not that only women think that man look best when clean-shaven; even most men (it would be right to call them Second-Grad-Woman) believe that they look their best when clean-shaven, and start decorating themselves like woman. This is really a neurotic society; here a woman is respected and accepted only when she becomes ‘Second-Grad-Man’. And this ‘पागलपन’ is known as women-emancipation-movement. In a healthy society, woman would be respected as woman; they would be loved and cared as they are. A woman should grow as woman, because only then, she can flower, and have satisfaction in life. Woman and man should look as different as possible, but yes, there should not be any discrimination, they both are ultimate manifestation of nature, nobody is lesser or higher. In the name of change, we are killing the beauty of life. No change is needed, only growth is required. What we do in the name of change…, we just shift prisoners from one jail to another. Healthy mind is attracted to opposite only. Attraction is always between to opposite poles. Man and woman both are beautiful; there is no need for a woman to be like man. Why should they…? What is lacking in them….? Last thing, who tells these ugly women to color their lips with lipstick…… to have natural read-lips, is one thing, but to color them with lipstick is sick, only sick woman does so. At the end, I would like to repeat……, those women who are interested in clean-shaven man are Lesbian, and those men who are interested in these Second-Grad-Woman, are Gay..!

    follyofawiseman के द्वारा
    May 9, 2012

    “बात है देश के जवलंत समस्याओ की…. “ सबसे पहले तो मैं आपसे ये कहना चहुगा की समस्या देश की नहीं व्यक्ति की होती है,…..देश बस एक व्यभारिक सच है….इसीलिए…..पिछले 5 हजार साल से हम देश और समाज की समस्याओं का हल ढूंढ रहें है….पर हम तक सब कुछ वैसा का वैसा है….हमारा उदेश्य तो अच्छा है…लेकिन तरीका गलत है…..हम जो है उसको नज़र अंदाज़ कर जो नहीं है उसके पीछे लगे रहते है…….! ”शयद आप बात की तह तक पहुचना ही नहीं चाहते…..” मैंने कुछ पहले एक लेख ‘मैं और मेरी समस्या’ मैं चाहूँगा की आप उसे एक बार पढ़े…फिर हम बात की तह तक पहुँचने की कोशिश करेंगे….. http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2012/04/01/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 10, 2012

    श्री संदीप जी…आपका लेख पढ़कर आपका नाम पता चल गया… हा,हा,हा,…सबसे पहले तो मै आपको बधाई देती हु आपका लेख “मैं और मेरी समस्या” के लिए…. क्या अंगारे उगले है आपने…. उम्मीद करती हु की ये अंगारे बुरइयो को ही जला कर राख करे …. क्या वेग है आपके विचारो का…. क्या उफान है आपकी सोच में…. शब्दों व विचारो के योद्धा है आप… आपके लेख पर दुसरे सभी मित्रो की मिलीजुली प्रतिक्रिया भी पढ़ी… मै आपके जैसी अंगार तो नहीं उगल सकती…..पर आपकी बात पर ( समस्या देश की नहीं व्यक्ति की होती है,) इतना ज़रूर कहना चाहूंगी की, व्यक्ति ही मिलकर समाज का निर्माण करते है, और ये समाज मिलकर देश का…इसलिए, यह सारे देश की क्या दुनिया की समस्या हुई, व्यक्तिगत नहीं…….और आप पिछले ५ हज़ार साल की बात कर रहे है…. यदि परिवर्तन के नज़रिए से देखा जाये तो पिछले ५ सालो में ही बहुत परवर्तन दिखाई देंगे…तो ५ हज़ार साल तो बहुर पुराणी बात है…. जो दिल परवर्तन चाहते है, उनकी आँखों को परवर्तन दिख जाते है…. मै यह नहीं कहती की लड़किया…लड़का बन जाये पर ये भी तो उचित नहीं है, की उन्हें एक बहू, बेटी, के रूप में प्रतार्नाये झेलनी पड़े… क्या वो स्वतंत्र नहीं रहना चाहती ….. मै समझती हुकी आप भी यही सोच रखते है..पर आपको तरीका गलत लग रहा है…. मरे हिसाब से जागरूकता और मानसिकता में परिवर्तन हमें इस समस्या से उबार सकती है…इसके अलावा यदि और कोई उपाय है तो कृपया उल्लेख कीजिये… इस दुनिया में… हर तरह के लोग होते है… किसी की रूह किसी से कांपती है तो किसी की कुछ और से… शायद आप आपनी स्वतंत्रता के खनन को बर्दाश्त नहीं कर सकते और आपकी कलम आतंकित हो उठती है…और मै सामाजिक बुरइयो को सुनकर या देखकर बर्दाश्त नहीं कर पाती और मेरी कलम वहां आतंकित हो उठती है….. यही फर्क है मेरी और आपकी सोच में. मै अपनी सोच से खुश हु और आप अपनी सोच से. कुछ लोग होते है…. जो हमेशा के परिवर्तन के लिए तैयार होते है और कुछ नहीं… आपके लेख से मुझे आपकी विचार धारा का पता चला और एहसास हुआ की आप अपनी स्वतंत्रता के आगे किसी की न चलने देंगे…. शायद इसलिए हमारा इस विषय पर चर्चा करना कतैह उचित नहीं है…. यह एक मित्र वत सन्देश है…इसे प्रतिद्वंदी सन्देश न समझे… धन्यवाद

    sheetal के द्वारा
    May 10, 2012

    hello

    sheetal के द्वारा
    May 10, 2012

    Smiile :) is all i can do after reading your reply, you are right you dont care because you have never earned respect, you are a blogger with a negative spark. This is an open forum and we have to regard people’s articles if one can not appreciate a blog atleast they should not demoralize it by putting in some negative comments. This is what i understand of a negative behavior,they can find something wrong in any situation, they are expert complainers, critics or victims, unfortunately negative people may not be concerned with the effect their behavior has on others, they simply want to get rid of their own feelings in the fastest way possible. Everything we do and say in our lives is shaped by our particular life experience, we learn from a very early age that certain behavior produce certain results and for people like them it says through out their lives. I dont want to judge or comment on whatever you have expressed, you might understand a women only if you are a son or a brother. Finally i would like to conclude by saying expressing ourselves in a more socially acceptable way takes advanced communication skills.. Like someone has wisely said.. If you don’t like something change it; if you can’t change it — change the way you think about…

    follyofawiseman के द्वारा
    May 10, 2012

    Meditate upon this story……. “The Sufi Bayazid says this about himself: “I was a revolutionary when I was young and my only prayer to God was: “Lord, give me the energy to change the world.” “As I approached middle age and realized that helf my life was gone without my changing a single soul, I changed my prayer to: “Lord, give me the grace to change all those who come in contact with me. Just my family and friends, and I shall be content.” “Now that I am an old man and my days are numbered, my one prayer is, “Lord, give me the grace to change myself. If I had prayed for this right from the start I would not have wasted my life.” Albert Einstein ने कहीं कहा है….”बुद्धि के किसी खास स्तर पर अगर किसी समस्या का जन्म होता है तो बुद्धि के उसकी स्तर पर उसका समाधान नहीं हो सकता है…….” मैंने इसी विषय पर पीछे लिखा……… ‘Plus Ca Change, Plus C’est La Même Chose!’ Ever since new government has been formed in UP, I have been wondering what change it will bring to the life of ordinary people in UP..? I always wonder whether change in government results in an improvement in situation? There is a French proverb plus ça change, plus c’est la même chose- the more things change, the more they stay the same. I don’t think the life of ordinary people will see any change in UP. There is no denial to the fact that it will bring some technical progress, but then the question is whether technical progress gets anywhere in the sense of increasing the delight and happiness of life. Moreover, isn’t it in a bid to solve one problem, we create thousands new problems…..?’

    follyofawiseman के द्वारा
    May 10, 2012

    नोट-ऊपर का कमेंट मैं ने अभिलाषा जी को जवाब देते हुए लिखा है……

    follyofawiseman के द्वारा
    May 10, 2012

    सीतल जी स्माइल :)  करने के लिए धन्यवाद……पीछे मैंने एक लेख( ‘एक किलो छ: सौ ग्राम का वो मुर्गा’ ) लिखा था जो बहुत ही कम लोगो को समझ आई…लेकिन मुझे भरोसा है कि आप को जरूर समझ मे आएगी…..मैं नीचे लिंक पोस्ट कर कररहा हूँ…..पहले इसे पढ़िए फिर हम आगे बात करेंगे……… http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2012/03/23/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8B-%E0%A4%9B-%E0%A4%B8%E0%A5%8C-%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B0/

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 10, 2012

    संदीप जी!!!!!!!! जी हाँ ..मै इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ की ये ऐसी समस्याए नहीं है, जिनका निवारण पलक झपकते या, चुटकी बजाते निकल आये…. ऐसे परिवर्तन के लिए पीढ़ी निकल जाती है…पर ऐसा भी नहीं है की असंभव है…… उदहारण के लिए, हमारे समाज में आज शिक्षा के प्रचार प्रसार की वजह से, गावो में न सही शहरों में तो “पर्दा प्रथा” काफी हदों तक ख़त्म हो गई… “सती प्रथा” जैसी बुराई भी ख़त्म हो गई…. “स्त्री शिक्षा” पर भी बहुत प्रोत्साहन मिला..आज लड़किया भी पढ़ लिख कर डॉक्टर और इंजिनियर बन रही है…वो भी विदेशो में जाकर अकेले रहकर जॉब कर रही है….. आपने पसंद का जीवन साथी ढूंढकर, ब्याह रचा रही है…आज कई माता पिता मिल जायेंगे जो एक बेटी के माता-पिता होने पर गर्व महसूस करते है…… ये सब परिवर्तन नहीं तो क्या है….???? इस सभी बुरइयो का अंत क्यों हो रहा ही…सिर्फ इसलिए की हमारे समाज की “मानसिकता” बदल रही है….और मानसिकता धीरे-धीरे ही बदलती है…. यदि हमें कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगानी है तो उसकी भी शुरुवात हमें आज से ही करनी होगी… “आज किये गए प्रयास हमारा कल सँवार सकते है”….आपने कहा…”Moreover, isn’t it in a bid to solve one problem, we create thousands new problems…..?’तो में कहना चाहूंगी की…यही ज़िन्दगी है मेरे दोस्त….. चलते रहन..बढ़ाते रहना…… हर नयी समस्यायों को हराकर आगे बढ़ना…. समस्या क्या है…आती रहती है, जाती रहती है…. …..उनसे क्या डरना… आने वाली समस्या , जिसका अभी अस्तित्व भी नहीं है..उससे डर कर बैठना बुस्दिली है…. यदि एक नदी में पानी थम जायेगा तो वह सड़ांध मारकर उपयोग करने योग्य नहीं रहेगा…लेकिन बहता रहेगा तो सदा ही स्वच्छ, व उपयोग करने योग्य रहेगा…. इसलिए हमें बढ़ते रहने है… न की जैसा है उसे वैसा ही छोड़ दे, वरना समाज भी उस थामे हुए पानी की तरह सड़ांध मरने लगेगा…..


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