Meri Kalam Se

Just another weblog

10 Posts

121 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10962 postid : 57

भ्रष्टाचार... अस्वस्थ समाज का प्रतिबिम्ब

Posted On: 4 May, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

भ्रष्टाचार…… यह  एक आम शब्द है जो दुनिया के हर  कोने में, जीवन के सभी क्षेत्रों में और दुनिया के सभी लोगों में  चर्चा का विषय बन गया है. यह एक ऐसी विश्व व्यापक घटना है, जो हमारे अपने देश में उच्च पदों के कुछ लोगों से लेकर तो निम्न स्तर पर काम कर रहे  कई व्यक्तियों तक इसका नासूर फ़ैल चूका है. यह एक ऐसा संक्रामक रोग है, जो दूसरो में देखकर ही लोगों  के मन में संक्रमित होने के भाव पैदा कर देता है. वही से मनुष्य सोचने लगता है, कि  “यदि  वह भ्रष्ट होते हुए भी, सुख और शांति का जीवन व्यतीत कर सकता है तो, मै क्यों न करू, और जीवन के हर सुख सुविधा के साधन प्राप्त करू.” बस यही से ये “भ्रष्टाचार” के दौड़ शुरू हो जाती है.

भ्रष्टाचार आम क्यों हो गया  है?  किन प्रमुख कारकों की वजह भ्रष्टाचार अंकुरित होता है…….? दरअसल, व्यक्ति समाज  का प्रतिबिम्ब है, वहाँ रहने वाले नागरिक, अपने  आस-पास भ्रष्टाचार  देखकर, स्वयं भ्रष्टाचारी होने लगते है. जिस  प्रकार  एक  पशु…  मानव  समाज  में  रहते  हुए  अपना  पशुत्व  त्यागने  लगता  है  और  मनुष्य  जंगले  में  रहते – रहते मानवता त्याग कर  पशुत्व  धारण  करने  लगता  है , ठीक  उसी  प्रकार  भ्रष्टाचारी  समाज  में  रहकर  सदाचारी  व्यक्ति  भी  कही  न  कही  भ्रष्टाचार   करने  पर  मजबूर  होने  लगता  है . उसके ह्रदय में पैसे व् रुतबे के प्रति लालच जागने लगता है. देखे हुए सभी स्वर्ण-स्वप्नों को पूरा करने के लिए, भ्रष्टाचार एक सरल रास्ता जान पड़ता है. ऐसे कुपोषित व अस्वस्थ समाज में रहते-रहते  लोगों की  बिना मेहनत किये, ज्यादा लाभ उठाने की मानसिकता बनने लगती है. जब आदमी के अन्दर अपनी क्षमता व् स्त्रोत से ज्यादा धनार्जन करने का लोभ आ जाता है, तब आदमी भ्रष्टाचार की दौड़ में शामिल हो जाता है. भ्रष्टाचार एक भ्रष्ट मानसिकता का परिणाम है. यह एक मानसिक बीमारी है. आज हमारे देश की यह सच्चाई है कि, करीब ९५% जनता किसी न किसी स्तर पर भ्रष्टाचार कर रही है. चाहे वह एक आम सब्जी बेचने वाला हो, सरकारी कर्मचारी हो, राजनेता हो, या बड़ा व्यवसायी हो.

ऊपर से हमारी कानून व्यवस्था के वाह !!!!!! क्या कहने. “जब  हमारे किये गुनाहों पर पर्दा डालने हेतु, हम भ्रष्टाचारियों को पैसे देकर पर्दा डाल सकते है तो किसी का काम करने हेतु, पैसे ले क्यों नहीं सकते यही मानसिकता तो हमें भ्रष्टाचारी बना रही है. कई बार ज़िम्मेदार कर्मचारी हमें भ्रष्टाचार बनने पर मजबूर कर देते है. हमारे कामों में विघ्न डालकर, उन्हें गैरकानूनी तरीके से करने पर दबाव डालते है, मजबूरन हमें करना पड़ता है. मगर याद रहे !!!! घूंस लेने या देने वाला, दोनों ही भ्रष्ट है.

यथार्त  तो यह है कि हमारे देश की कार्य प्रणाली  व् कानून व्यावस्था ही इस बात के लिए ज़िम्मेदार है. सउदाहरण ….यदि एक परिवार में संरक्षण  प्रदान  करने  वाले  माँ- पिता दोनों ही व्यभिचारी  होंगे , तो वो अपने बच्चे को सदाचारी   कैसे बनायेंगे . ठीक उसकी तरह, जब देश के कर्ता-धर्ता व कानून के रक्षक ही, भ्रष्टाचारी होंगे तो समाज में हो रहे भ्रष्टाचार को कैसे रोक पाएंगे . आम नागरिको द्वारा किये जाने वाले  भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए ही तो कानून बनते है, लेकिन यदि उन कानूनों को लागू करने वाले, लागू ही न करे, या उनका तोड़ निकाल  ले, तो देश कैसे इस नासूर का इलाज करेगा.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुरानी व्यवस्था अपने सभी मूल्यों के साथ एक खंडहर में छोड़ दी गयी थी. युद्ध, मंदी, तनाव व तीव्र गति से बढाती जनसँख्या  के कारन, लोगो की मानसिकता भ्रष्ट हो गयी और उन्होंने कानूनों का तोड़ निकाल लिया. आज, इस स्वतंत्र भारत में सभी सरकारी विभागों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिकारी सबसे भ्रष्ट व्यवसायियों के  बहुत करीब हैं. यह मिलीभगत का दुष्चक्र  आग की तरह पूरे समाज को निगल भ्रष्टाचार फैला रहा है. राजनेता  व सामाजिक  नेता  जो  देश के संरक्षक   है, सभी समाज के अमीर लोगों से जुड़े रहकर  उन्ही पर निर्भर होते है. ये सभी समुदाय मिलकर समाज व सरकार  को अपने इशारों  पर नचाते है. इसके बाद  एक  आम  आदमी  सोचता  है कि… “जब  हमारी  सरकार  ही  भ्रष्ट  है… हमारे  देश  के  संरक्षक  ही  भ्रष्ट  है , व  अपने  लाभ  हेतु  कार्यरत  है , तो  हम  अपने   लाभ  के  लिए  प्रयास  क्यों  न  करे …” परिणामतः … एक आम आदमी भी  भ्रष्टाचार से  संक्रमित  हो  जाता  है.

इस नासूर को ख़त्म करने करने के लिए एक सुद्रह्द कानून व्यवस्था सर्वोपरि है. जिसके तहत गुनाहगार को कड़ी सजा अनिवार्य होनी चाहिए. व्यवस्थाये पारदर्शी व निष्पक्ष होनी चाहिए.

कानून जितने पुराने होंगे, उनका तोड़ भी समाज में उपस्थित होगा… पुराने कानून, नयी पहेलियों को हल करने में विफल होते है. इसलिए, हमें चाहिए  कि, समय-समय पर कानूनों में परवर्तन करके उन्हें मज़बूत व  बेतोड़ बनाये.

भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्काल फैसला, लोगो के दिलो में कानून के प्रति यह विश्वास दिलाता है, कि व्यवस्थाये सुद्र्ह्द है, और आगे भ्रष्टाचार करने के प्रति डर पैदा करता है.

देश के नागरिक होने के नाते ये हमारा भी कर्तव्य बनता है, कि भ्रष्टाचारियों को हम मनोरंजित नहीं करे  व गलत तरीके से अपने कार्यों को सिद्ध न करे.

यही अंतर है हमारे देश व् दुसरे उत्तरी देशों में. भ्रष्टाचार सभी देशों में है, पर उन्हें नियंत्रित करने की नीयत व प्रयास सभी देशों में नहीं है. दुर्भाग्य वश हमारा देश इस प्रयासों से अछूता है.

यह भ्रष्टाचार, मनुष्य के अन्दर पाया जाने वाला जन्मसिद्ध कारक है , जो कमज़ोर व दुर्बल कानून व्यवस्था के कारण उग्र हो जाता है… शायद इसे जड़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता (क्योंकि यह मनुष्य के खून में है) पर निश्चित रूप से नियंत्रित ज़रूर किया जा सकता है. अच्छी नियंत्रण व्यवस्था समाज में भ्रष्टाचार को शिथिल कर देती है. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण ही इस समाज को सवस्थ व सुपोषित बना सकता है.  “ सफल  प्रयास  ही कार्यों  को  अंजाम  दे  सकते  है ….”

अभिलाषा शिवहरे गुप्ता

मई ३, २०१२



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

16 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 6, 2012

यह भ्रष्टाचार, मनुष्य के अन्दर पाया जाने वाला जन्मसिद्ध कारक है सच कहा है आपने जन्म लेते ही नर्सो को बधाई देने के साथ ही अबोध बालक/बालिका के जीवन से भ्रष्टाचार के जुड़ने की शुरुआत हो जाती है जोकि उसके अंत समय तक जारी रहती है जिस बुराई से हम लड़ ही नहीं सकते उसकी चिंता करने से कोई फायदा नहीं लेकिन आपका लेख और इसमें दिखाए विचार बहुत बढ़िया है

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 7, 2012

    राजकमल जी..लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद्… पर कहना चाहूंगी की, इससे लड़ना असंभव नहीं है… किसी अच्छे cause की लड़ाई लम्बी हो सकती है पर प्रतिफल में सफलता के कई कदम आगे ज़रूर बढ़ जायेंगे… सिर्फ कानून की सक्ती इंसान के अन्दर डर पैदा करेंगी , यदि इतना भी हो गया तो इसमें नियंत्रण चालू हो जायेगा और कुछ सालो बाद हम भी दुसरे उत्तरी देशों की तरह काफी हदों तक इस नासूर का इलाज कर सकेंगे…एक अच्छी नियंत्रण व्यवस्था ही काफी है….. हमारे अन्दर किसी प्रकार का डर नहीं है, इसलिए इस नासूर का इलाज नहीं हो प् रहा है…विश्वास कीजिये ये मेरा विश्वास है, की हमें सफलता ज़रूर मिलेगी….. आखिर भारत ने स्वतंत्रता की लड़ाई भी २५० सालो तक लड़ी तब जाकर भारत आज़ाद हुआ…यह लड़ाई भी लम्बी चल सकती है…पर असफल नहीं होगी…. शायद अभी के नेता गन नहीं सुधरेंगे, क्योंकि उनके हाथ इतने काले हो चुके है की उन्हें छूटने का प्रयास भी वो करेंगे तो सारा पानी ही गन्दा हो जायेगा, पर हाथ साफ़ नहीं कर पाएंगे…उन्हें राज पाठ त्यागना पड़ेगा, उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी….इसलिए वो चाहकर भी प्रयास नहीं करंगे…पर इस लड़ाई के चालू होने से… जो आने वाली generations होंगी…वो सोच समझ कर ही राजनीती में आएँगी….. सिर्फ अच्छी न्याय व्यवस्था….सिर्फ….पुनः धन्यवाद्…

rekhafbd के द्वारा
May 6, 2012

अभिलाषा जी ,भ्रष्ट सरकार के चलते आम आदमी भी संक्रमित होता जा रहा है ,बढ़िया विषय ,सार्थक लेख ,बधाई

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 7, 2012

    धन्यवाद् रेखा जी… दुर्भाग्य वश, ये हमारे देश का कडुवा सच है…

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 5, 2012

भ्रष्टाचार तो सदा से एक दीमक रहा है…………….और हम मजबूत लकड़ी से कमजोर होते जा रहें है………………………..सार्थक विश्लेषण आपका अभिलाषा जी…………सुन्दर सोच

yogi sarswat के द्वारा
May 5, 2012

यह भ्रष्टाचार, मनुष्य के अन्दर पाया जाने वाला जन्मसिद्ध कारक है , जो कमज़ोर व दुर्बल कानून व्यवस्था के कारण उग्र हो जाता है… शायद इसे जड़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता (क्योंकि यह मनुष्य के खून में है) पर निश्चित रूप से नियंत्रित ज़रूर किया जा सकता है. अच्छी नियंत्रण व्यवस्था समाज में भ्रष्टाचार को शिथिल कर देती है. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण ही इस समाज को सवस्थ व सुपोषित बना सकता है. बहुत सटीक लेखन !

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 5, 2012

    धन्यवाद् योगी जी…. जहा जहा बुध्धि जीवी होंगे …वहा-वहा भ्रष्टाचार होगा…. भ्रष्टाचार बुद्धि की ही उपज है… जब बुद्धि को लालच का बोध होता है, और वह लालच का ज्ञान ही हमसे भ्रष्टाचार करवाता है…इसलिए हमे समाज को भ्रष्टाचार रहित बनाने हेतु हम सभी के प्रयास आवश्यक है… हमें दुसरे उत्तरीय देशो से सीख लेनी चाहिए जहा भ्रष्टाचार अल्पसंख्यक है… उनके प्रयास ही उन्हें भ्रष्टाचार रहित देश बनाने की और अग्रसर कर रहे है… पर हम बुद्धि विहीन, उनके एक या दो घटना सुनकर उन्हें generalize कर देते है..

sheetal के द्वारा
May 5, 2012

अबिलाषा जी नमस्ते आपके इस अर्टिकल में कितनी सचाई है सही तरीके से आपने दर्शाया है, भ्रष्टाचार नाम का दीमक हमारे देश को कितना बदनाम और खोकला कर दिया है, जिस देश को सोने की चिडया कहा जाता था आज वही देश दुनिया का साबसे गरीब देश है, और इसके जिमेदार सिर्फ यह नेता लोग है जो कुद्गार्ज़ी और लालच में इतना डूब चुके है के उनको अपने moti बैंक account के सिवा कुछ nahi nazar aata… bohot ही बढ़िया लिखा है….yuhi लोल्हते रहिये है, हमारी शुब कामनाये हमेशा आपके साथ है….

अजय कुमार झा के द्वारा
May 5, 2012

भ्रष्टाचार के मूल कारणों पर बढिया विश्लेषण करती पोस्ट । सच कहा है आपने और अब तो ये एक नासूर का रूप लेता जा रहा है

jyotsnasingh के द्वारा
May 4, 2012

अभिलाषा जी, बहुत पहले ही काका हाथरसी ने कह दिया था ,रिश्वत लेते पकडे जाओ ,रिश्वत दे कर छूट जाओ.तो यह एक बहुत पुराणी बीमारी है.और आप को बता दूं यह किसी वर्ग वीशेष की बपोती नहीं है.इस हमाम में सब नंगे हैं .अभी परसों की बात है मैं रेहड़ी वाले से टमाटर खरीद रही थी,२० के डेढ़ किलो में तै हुआ. टमाटर तोलते समय जब मैंने उसके बाट देखे तो उसने ५००ग्रम की जगह २०० ग्राम का बाट रखा था और पूछने पर बताया तो कहने लगा की रेट वर नहीं खाता क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? jyotsna

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 4, 2012

    बिलकुल सही कहा ज्योत्सना जी… यह भ्रष्टाचार बहुत पुराणी बीमारी है जो हर वर्ग में फ़ैल चुकी है… आज एक ऑफिस में ओफ्फिसर तक आपनी फाइल पहुचने के लिए चपरासी को भी रिश्वत देनी पड़ती है…यह एक विडम्बना है की हर छोटे काम के लिए हमें रिश्वत देनी पड़ती है….. या हर बड़े से बड़े काम के लिए हम रिश्वत देकर उसे गैरकानूनी तरीके से करा लेते है… दोनों ही स्थितिया समाज के लिए नासूर है..

चन्दन राय के द्वारा
May 4, 2012

अभिलाषा जी , भ्रस्ताचार के असुर ने जैसे अमृत पि लिया है , आज इतना विकराल रूप ले लिया इस प्रदुषण ने की हम रोज इसकी सांस ले ले हम भी काले हो चुके है , मुझे लगता है ऐसा कोई नहीं है जिसने किसी न किसी रूप में कभी ना कभी भ्रष्टाचार किया हो , आपका आलेख पहली बार पढ़ा , प्रभावित हूँ आपकी लेखन शक्ति से

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 4, 2012

    धन्यवाद् चन्दन जी.. ये भ्रष्टाचार एक तरह का नशा है… एक बार उसका चस्का लग जाये तो उसे छोड़ पाना मुश्किल होता है…इसी लिए तो कानून व्यवस्था इतनी मज़बूत होनी चाहिए की ये चस्का जहा शुरू हुआ, वाही ख़त्म कर दिया जाये… धन्यवाद्… मेरा लेख पढ़ने के लिए.

    jlsingh के द्वारा
    May 5, 2012

    भ्रष्टाचार का समूल विनाश आवश्यक है, पर पहले अपने गिरबान में झांकना भी जरूरी है. सजा जब तक नहीं होती हम सम्हल नहीं सकते! इसलिए त्वरित न्याय और दंड दोनों जरूरी है. सारगर्भित आलेख के लिए बधाई!

    abhilasha shivhare gupta के द्वारा
    May 5, 2012

    नमस्ते jlsingh ji …….. मैंने दोनों के पहलुओ पर प्रकाश डाला है…. एक बार ज़रा सोचिया… कानून व्यवस्थाये देश के अनुशाशन को नियंत्रित करती है या नागरिक नियंत्रित करते है … कानून बनाये जाते है, नागरिको द्वारा किये गुनाहों पर सजा देने के लिए… यदि सजा देने वाले ही ढीले रहेंगे तो नागरिक तो गुनाह पर गुनाह करते ही जायेंगे… इसलिए पहले कानून व्यवस्था इतनी मजूत होनी चाहिए की नागरिक अपराध करने में डरे… उनके सजाए इतनी कठिन होनी चाहिए की गुनाहगार चाहकर भी, बच न पाए….तब तो हम आम नागरिक आपने गरेबान में झाँक कर देखेंगे…..और निर्णय लेंगे की हमें गलत काम नहीं करने है… यदि हमारा पिता ही व्यभिचारी हो तो वह हमें कैसे सदाचारी बनाएगा…. आपने बिलकुल सही फ़रमाया की दोनों ही पक्ष को इस बारे में सोचना ज़रूरी है… पर पहल तो कानून के रखवालो को ही करनी होगी….. क्योंकि कानून बने ही समाज के लिए है…. यदि समाज स्वयं ही अच्छा होता, जो कानून बनाये ही नहीं जाते,,, धन्यवाद्…

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 4, 2012

यथार्थ, आपके विचारों से सहमत.


topic of the week



latest from jagran